सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

#मैं_जनक_नंदिनी..... (158)by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब🌺_(सीता व्यथा की आत्मकथा )_🌺*"वैदेही की आत्मकथा" गतांक से आगे -*मैं वैदेही ! मैं कब मूर्छित हो गयी थी मुझे पता नही ।मेरे तो मुख पर जल का छींटा दिया था ..........तब जाकर मुझे कुछ होश आया ..............मैने सामनें देखनें की कोशिश की ...........एक दिव्य तेज सम्पन्न ऋषि खड़े थे......मुझे देखते हुये वो रो रहे थे ।पर ये क्यों रो रहे हैं ? मैने इधर उधर देखा था ..........मेरे आस पास कुछ ब्रह्मचारी बालक खड़े थे ..............।मैं कहाँ हूँ ? मेरा मस्तक असह्य पीड़ा का अनुभव कर रहा था ।ये अयोध्या तो नही है ? मैं यहाँ कैसे ? ओह ! मुझे तो मेरे श्रीराम नें त्याग दिया ।मुझे लक्ष्मण छोड़ कर चला गया है ।पुत्री ! तुम वैदेही हो ना ? उन ऋषि नें मुझे पूछा ।मैं क्या कहती ........मैं अपनें में ही नही थी .......कुछ नही बोली ।तुम जनक नन्दिनी हो ना ? मैं ऋषि वाल्मीकि ।उन अत्यन्त तेजपूर्ण ऋषि नें मुझे अपना परिचय दिया ।तुम्हारे पिता जनक मेरे अच्छे मित्रों में से हैं ........मैनें तुम्हे बचपन में जनकपुर में बहुत बार देखा है .........हम ज्ञान की चर्चा के लिये तुम्हारे पिता के पास में ही जाते थे ।मैनें उठनें की कोशिश की ........उन्हें प्रणाम करनें के लिए .....पर नही उठ सकी .........शरीर में मानों अब कोई शक्ति रही ही नही ।मैं तो गंगा किनारे सन्ध्या कर रहा था .....ये मेरे ब्रह्मचारी बालक हैं .....इन्होनें ही मुझे बताया कि .........कोई नारी मूर्छित पड़ी है ।मैं कुछ सोचता कि उससे पहले ही लक्ष्मण का रथ दूर से जाता हुआ दिखाई दिया ...........मैं समझ गया .......कि राम नें अपनी आल्हादिनी का त्याग कर दिया है । ऋषि बोले जा रहे थे ।आपको पता है ? मैने आश्चर्य व्यक्त किया ।........हाँ मुझे पता है .........मुझे ऋषि दुर्वासा नें सब पहले ही बता दिया था ।......ये कहते हुए ....उनके नेत्र सजल थे ........।पुत्री ! श्रीराम का जन्म ही लोक शिक्षा , मर्यादा इन्हीं सबके लिये हुआ है । तुम्हे त्यागना तो इसकी शुरुआत है पुत्री ! मैनें महर्षि की ओर देखा .......पूछा क्या औरों को भी त्यागेंगें ? अत्यन्त दुखपूर्वक महर्षि कह रहे थे ........लक्ष्मण शत्रुघ्न भरत सबका त्याग करके अकेले धर्म के लिये लड़ते हुये अपनें धाम जायेंगें ।मैं अब उठी .........हाँ लड़खड़ाते हुए उठी ...............प्रणाम किया महर्षि के चरणों में , मैनें ।पुत्री ! तुम चलो मेरे आश्रम.........नही नही तुम्हे चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नही है ............मेरे आश्रम के एक भाग में कुछ तपश्विनी भी रहती हैं ..........वहाँ किसी पुरुष का प्रवेश नही है ।पुत्री ! मैं ऋषि वाल्मीकि तुम्हारे पिता जनक का मित्र हूँ .......तो तुम्हारा भी पिता समान ही हुआ ना !मैं रो गयी थी फिर .....................मुझे मेरे पिता, मेरी माँ मेरा भाई और मेरा जनकपुर सब याद आरहे थे ।पुत्री ! रोओ मत !ये कहते हुये महर्षि स्वयं अपनें आँसू पोंछ रहे थे ।वो चल पड़े अपनें आश्रम की ओर ..........पर बहुत धीरे चल रहे थे ।मैं इस समय चल रही हूँ यही क्या कम है .........वो ये जानते थे इसलिये धीमी गति से चलते हुये अपनें आश्रम में मुझे ले आये ।****************************ये वन देवी हैं .........मेरा नाम ही बदल दिया था महर्षि नें ।इससे ज्यादा इनसे कोई प्रश्न नही करेगा ...........ये गर्भ से हैं .......इसलिये इनको सम्भालना आप सबकी जिम्मेवारी है ।एक तपस्विनी गयीं और कुछ सूखे मेवे फल दूध इत्यादि लेकर आईँ .............।मुझे अभी कुछ खानें की इच्छा नही है .......मैने महर्षि की ओर देखा ।पुत्री ! खाओ ..............अपना नही तो कमसे कम गर्भस्थ शिशु का तो ध्यान रखो ..........इन्होनें क्या अपराध किया है !मेरे सिर में हाथ रखा ये कहते हुये महर्षि नें ...........मुझे तो ऐसा लगा जैसे मेरे पिता ने ही मुझे संरक्षण दिया हो ।महर्षि अपनी कुटिया में चले गए ...............।मेरे लिये एक स्वच्छ सी कुटिया ..........मेरा कितना ध्यान रख रही थीं वो सब तपश्विनी.........मुझे कुछ करनें नही देती थीं ।एक दिन शत्रुघ्न कुमार आगये थे ..........मथुरा जा रहे थे उनके अग्रज ने ही उन्हें भेजा था लवणासुर को मारनें .........तब रुके थे ।मुझे देखा तो रो पड़े .........बहुत रोये.............मैने ही उन्हें समझाया...फिर पूछा....अयोध्या की स्थिति कैसी है अब ! भाभी माँ ! अयोध्या का तो अधिदैव ही चला गया है ...........वहाँ अब रहा ही कौन ? मात्र एक कठोर आदर्शवान राजा ।मुझे जो बताया शत्रुघ्न कुमार नें.......कि जब लक्ष्मण लौट कर गए मुझे छोंड़नें के बाद .......तब जो स्थिति थी मेरे श्रीराम की ........उसे सुनकर तो मैं भी बिलख उठी ........नही ......मेरे श्रीराम को सम्भालना शत्रुघ्न भैया ! .........शत्रुघ्न कुमार नें बताया कि ...........शेष चरित्र कल ...........!!!!!🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹,

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

*कालिदास बोले 😗 माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.*स्त्री बोली 😗 बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।*कालीदास ने कहा 😗 मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।*स्त्री बोली 😗 तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।*कालिदास ने कहा 😗 मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।*स्त्री बोली 😗 तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?.(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)*कालिदास बोले 😗 मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।*स्त्री ने कहा 😗 नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ? (कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)*कालिदास बोले 😗 मैं हठी हूँ ।.*स्त्री बोली 😗 फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? (पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)*कालिदास ने कहा 😗 फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।.*स्त्री ने कहा 😗 नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)*वृद्धा ने कहा 😗 उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)*माता ने कहा 😗 शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।.कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।शिक्षा :-विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है। दो चीजों को कभी *व्यर्थ* नहीं जाने देना चाहिए.... By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब. *अन्न के कण को* "और"*आनंद के क्षण को* 🙏Jai Mata Di🙏

🌹🌳जय श्री राधे कृष्णा जी 🌹by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब🌳शुभ संध्या वंदना जी🌹🌳🥀🌲🥀🌲🥀#🌲🥀🙏_बिहारी_जी_का_आसन_"🙏🏻🌹.बहुत समय पहले कि बात है बिहारी जी का एक परम प्रिय भक्त था। वह नित्य प्रति बिहारी जी का भजन-कीर्तन करता था।🌳🌲🥀.उसके ह्रदय का ऐसा भाव था कि बिहारी जी नित्य उसके भजन-कीर्तन को सुनने आते थे।.एक दिन स्वप्न में बिहारी जी ने उससे शिकायत करते हुए कहा, तुम नित्य प्रति भजन-कीर्तन करते हो और मैं नित्य उसे सुनने आता भी हूं... 🌹🌳🌲.लेकिन आसन ना होने के कारण मुझे कीर्तन में खड़े रहना पड़ता है, जिस कारण मेरे पांव दुख जाते है, .अब तू ही मुझे मेरे योग्य कोई आसन दे जिस पर बैठ मैं तेरा भजन-कीर्तन सुन सकू।🌲🥀.तब भक्त ने कहा, प्रभु ! स्वर्ण सिंहासन पर मैं आपको बैठा सकूं इतना मुझमें सार्मथ्य नहीं और भूमि पर आपको बैठने के लिए कह नहीं सकता। .यदि कोई ऐसा आसन है जो आपके योग्य है तो वो है मेरे ह्रदय का आसन आप वहीं बैठा किजिये प्रभु।.बिहारी जी ने हंसते हुए कहा, वाह ! मान गया तेरी बुद्धिमत्ता को... 🌲🥀.मैं तुझे ये वचन देता हूं जो भी प्रेम भाव से मेरा भजन-कीर्तन करेगा मैं उसके ह्रदय में विराजित हो जाऊंगा।🌳🌲🥀.ये सत्य भी है और बिहारी जी का कथन भी। .वह ना बैकुंठ में रहते है ना योगियों के योग में और ना ध्यानियों के ध्यान में, वह तो प्रेम भाव से भजन-कीर्तन करने वाले के ह्रदय में रहते है।।🌳.बोलिए श्री बांके बिहारी लाल की जय....🙌🌺

इंतजार के आँचल मेंसबर की आख़िरी हिचकी ले दम तोड़ रही है मेरी महुबबतपरवाह का गंगा जलबख़्श दो आख़िरी जज़्बातों को उम्मीद की चंद साँसें फूँक दोबुझते अहसासों मेंया फिर आ जाना मेरी रूखसती पेउधार माँग थोड़ी फुरसत कहीं सेलबों से अपने बंद कर देनाराह तकती मेरी आँखो को "राधा रानी"💐🌹जय जय श्री राधे।।💐🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

इंतजार के आँचल में सबर की आख़िरी हिचकी  ले दम तोड़ रही है  मेरी महुबबत परवाह का गंगा जल बख़्श दो आख़िरी जज़्बातों को  उम्मीद की चंद साँसें फूँक दो बुझते अहसासों में या फिर आ जाना मेरी रूखसती पे उधार माँग थोड़ी फुरसत कहीं से लबों से अपने बंद कर देना राह तकती मेरी आँखो को  "राधा रानी" 💐🌹जय जय श्री राधे।।💐🌹 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏