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ग्रह-नक्षत्र, कर्मफल और सुख-दु:ख क्या है? क्या स्वकर्म से ही बनती है मनुष्य की जन्मकुण्डली!!!!! !By #वनिता #कासनियां #पंजाब🙏🙏❤️मनुष्य के सुख-दु:ख का कारण ग्रह-नक्षत्र हैं या उसके कर्म ? क्या दु:ख नाश के लिए ग्रह-नक्षत्रों की आराधना की जानी चाहिए या अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए ?सबको अपना भविष्य जानने की इच्छा होती है, इसके लिए हम ज्योतिष का सहारा लेते हैं । ज्योतिषशास्त्र कर्मफल बताने की विद्या है । ज्योतिषशास्त्र किसी भी मनुष्य के भावी सुख-दु:ख की भविष्यवाणी करता है और ग्रहों को इसका कारण मानकर ग्रहशान्ति के लिए दान-जप-हवन आदि उपाय बताता है ।कर्मों की गहन गति!!!!!!!!यह संसार मनुष्य की कर्मभूमि और भोगभूमि दोनों है। जन्म-जन्मान्तर में किए हुए समस्त कर्म संस्काररूप से मनुष्य के अंतकरण में एकत्र रहते हैं, उनका नाम ‘संचित कर्म’ है । उनमें से जो वर्तमान जन्म में फल देने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं, उनका नाम ‘प्रारब्ध कर्म’ है और वर्तमान समय में किए जाने वाले कर्मों को ‘क्रियमाण कर्म’ कहते हैं । ज्योतिषशास्त्र इन्हीं कर्मों के फल को उसी प्रकार दिखलाता है जैसे अंधेरे में पड़ी हुई वस्तु को दीपक का प्रकाश ।ग्रह-नक्षत्र शुभ-अशुभ फल नहीं देते, मनुष्य के कर्म से मिलता है सुख-दु:खमहाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार एक बार भगवान शंकर से पार्वतीजी ने पूछा—मनुष्यों की जो अच्छी-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनी का फल है, किन्तु संसार में लोग शुभ-अशुभ कर्म को ग्रहजनित मानकर ग्रह-नक्षत्रों की आराधना करते रहते हैं, क्या यह ठीक है ?भगवान शंकर ने कहा—‘ग्रहों ने कुछ नहीं किया । ग्रह-नक्षत्र शुभ-अशुभ कर्मफल को उपस्थित नहीं करते हैं, अपना ही किया हुआ सारा कर्म शुभ-अशुभ फल देने वाला है ।’शुभ कर्मफल की सूचना शुभ ग्रहों द्वारा और बुरे कर्मों की सूचना अशुभ ग्रहों द्वारा होती है।वास्तव में किसी भी मनुष्य के सुख-दु:ख का कारण ग्रह-नक्षत्र नहीं है । ग्रह कर्मों के फलदाता और कर्मफलों के सूचक हैं। जीवों के कर्मों का फल देने वाले भगवान श्रीविष्णु ही ग्रहरूप में रहते हैं । सूर्य का रामावतार, चन्द्रमा का कृष्णावतार, मंगल का नृसिंहावतार, बुध का बुद्धावतार, बृहस्पति का वामनावतार, शुक्र का परशुरामावतार, शनि का कूर्मावतार, राहु का वराहावतार और केतु का मीनावतार है । (लोमशसंहिता)मनुष्य के कर्मफल का भण्डार अक्षय है उसे भोगने के लिए ही जीव चौरासी लाख योनियों में शरीर धारण करता आ रहा है। इसीलिए मानव शरीर का एक नाम ‘भोगायतन’ है।कर्मफल अटल हैं इन्हें भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता है। हम अपने सुख-दु:ख, सौभाग्य-दुर्भाग्य के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं, इसके लिए विधाता या अन्य किसी को दोष नहीं दिया जा सकता है—ऐसा जानकर शान्त रहना चाहिए।रामचरितमानस में तुलसीदासजी कहते हैं—काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।निज कृत करम भोग सबु भ्राता ।। (राचमा २।९२।४)प्रकृति ने मानव जीवन में सन्तुलन के लिए यह व्यवस्था की है कि कुण्डली में छ: भाव सुख के व छ: भाव दु:ख के हैं । दु:ख के बीज से सुख का अंकुर फूटता है। सुख के फल में दु:ख की गुठली होती है । सुख-दु:ख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।जैसा बोयेंगे वैसा पायेंगे!!!!!!!जो हम बोते हैं, वही हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है । प्रकृति की इस व्यवस्था से सुख बांटने पर वह हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है और दूसरों को दु:ख देने पर वह भी कई गुना होकर हमारे पास आता है । जैसे बिना मांगे दु:ख मिलता है, वैसे ही बिना प्रयत्न के सुख मिलता है ।करम प्रधान बिस्व करि राखा ।जो जस करइ तो तस फलु चाखा ।। (राचमा २।२१९।४)जब सुख-दु:ख हमारे ही कर्मों का फल है तो सुख आने पर हम क्यों फूल जाएं और दु:ख पड़ने पर मुरझाएं क्यों ? क्योंकि सुख-दु:ख सदा रहने वाले नहीं और क्षण-क्षण में बदलने वाले हैं । सुख-दु:ख जब अपनी ही करनी का फल हैं तो एक के साथ राग और दूसरे के साथ द्वेष किसलिए ? गीता में भगवान कहते हैं—इहैव तैर्जित सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: । (५। १९)अर्थात्—जिन लोगों के मन में सुख-दु:ख के भोग में समता आ गई है उन्होंने तो इसी जन्म में और इसी शरीर से ही संसार को जीत लिया और वे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए ।मनुष्य स्वयं भाग्यविधाता!!!!!!!भाग्य का विधान अटल है । जितने भी ज्योतिषीय उपाय हैं, वे सब तात्कालिक हैं । मनुष्य यदि अपने को एक खूंटे (इष्टदेव) से बांध ले और ध्यान-जप, सत्कर्म और ईश्वरभक्ति को अपना ले तो जीवन में सब कुछ शुभ ही होगा । कर्म रूपी पुरुषार्थ से ही मनचाहे फल की प्राप्ति होती है । मनुष्य स्वयं भाग्यविधाता है काल तो केवल कर्मफल को प्रस्तुत कर देता है ।यदि मनुष्य जन्म-मरण के जंजाल से छूटना चाहता है तो भगवान ने उसका भी रास्ता गीता में बताया है—‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरते तथा ।’ (अध्याय ४। ३७)ज्ञानरूपी अग्नि संचित कर्म के बड़े-से-बड़े भण्डार को क्षणभर में जला डालती है । ज्ञान की चिनगारी जब पाप के ईंधन पर गिरती है तो पाप जलते हैं । ज्ञान को अपनाने पर कर्म सुधरेंगे । तत्वज्ञान होने से कर्म वास्तव में कर्म नहीं रह जाते तब उनका फल तो कैसे ही हो सकता है ? अत: समस्त कर्मों के साथ उनका कर्मफल भी मिट जाता है और जीव को पुन: शरीर धारण नहीं करना पड़ता ।यह ज्ञान क्या है? यह है— हम भगवान के हैं, वे हमारे हैं, फिर उनसे हमारा भेद क्या? हम दासत्व स्वीकार कर लें और जो कुछ करें उनके लिए करें (सब कर्म कृष्णार्पण कर दें) या फल की भावना का त्याग कर दें नहीं तो कर्म रूपी भयंकर सर्प काटता ही रहेगा। करने में सावधान रहें और जो हो जाए उसमें प्रसन्न रहे एवं भगवन्नाम जपते रहें, आप एक सच्चे कर्मयोगी बन जाएंगे।कर से कर्म करो विधि नाना ।मन राखो जहां कृपा निधाना ।।प्रभु बैठे आकाश में लेकर कलम दवात।खाते में वह हर घड़ी लिखते सबकी बात ।।मेरे मालिक की दुकान में सब लोगों का खाता ।जितना जिसके भाग्य में होता वह उतना ही पाता ।।क्या साधु क्या संत, गृहस्थी, क्या राजा क्या रानी ।प्रभु की पुस्तक में लिखी है सबकी कर्म कहानी ।।सभी जनों के जमाखर्च का सही हिसाब लगाता ।बड़े-बड़े कानून प्रभु के, बड़ी बड़ी मर्यादा ।।किसी को कौड़ी कम नहीं देता और न दमड़ी ज्यादा ।इसीलिए तो दुनिया में वह जगतसेठ कहलाता ।।करते हैं सभी फैसले प्रभु आसन पर डट के ।उनके फैसले कभी न बदले, लाख कोई सर पटके ।।समझदार तो चुप रहता है, मूर्ख शोर मचाता ।अच्छी करनी करो चतुरजन, कर्म न करियो काला ।।धर्म कर्म मत भूलो रे भैया, समय गुजरता जाता ।मेरे मालिक की दुकान में सब लोगों का खाता ।।

ग्रह-नक्षत्र, कर्मफल और सुख-दु:ख क्या है? क्या स्वकर्म से ही बनती है मनुष्य की जन्मकुण्डली!!!!!!

By #वनिता #कासनियां #पंजाब🙏🙏❤️

मनुष्य के सुख-दु:ख का कारण ग्रह-नक्षत्र हैं या उसके कर्म ? क्या दु:ख नाश के लिए ग्रह-नक्षत्रों की आराधना की जानी चाहिए या अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए ?

सबको अपना भविष्य जानने की इच्छा होती है, इसके लिए हम ज्योतिष का सहारा लेते हैं । ज्योतिषशास्त्र कर्मफल बताने की विद्या है । ज्योतिषशास्त्र किसी भी मनुष्य के भावी सुख-दु:ख की भविष्यवाणी करता है और ग्रहों को इसका कारण मानकर ग्रहशान्ति के लिए दान-जप-हवन आदि उपाय बताता है ।

कर्मों की गहन गति!!!!!!!!

यह संसार मनुष्य की कर्मभूमि और भोगभूमि दोनों है। जन्म-जन्मान्तर में किए हुए समस्त कर्म संस्काररूप से मनुष्य के अंतकरण में एकत्र रहते हैं, उनका नाम ‘संचित कर्म’ है । उनमें से जो वर्तमान जन्म में फल देने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं, उनका नाम ‘प्रारब्ध कर्म’ है और वर्तमान समय में किए जाने वाले कर्मों को ‘क्रियमाण कर्म’ कहते हैं । ज्योतिषशास्त्र इन्हीं कर्मों के फल को उसी प्रकार दिखलाता है जैसे अंधेरे में पड़ी हुई वस्तु को दीपक का प्रकाश ।

ग्रह-नक्षत्र शुभ-अशुभ फल नहीं देते, मनुष्य के कर्म से मिलता है सुख-दु:ख
महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार एक बार भगवान शंकर से पार्वतीजी ने पूछा—मनुष्यों की जो अच्छी-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनी का फल है, किन्तु संसार में लोग शुभ-अशुभ कर्म को ग्रहजनित मानकर ग्रह-नक्षत्रों की आराधना करते रहते हैं, क्या यह ठीक है ?

भगवान शंकर ने कहा—‘ग्रहों ने कुछ नहीं किया । ग्रह-नक्षत्र शुभ-अशुभ कर्मफल को उपस्थित नहीं करते हैं, अपना ही किया हुआ सारा कर्म शुभ-अशुभ फल देने वाला है ।’

शुभ कर्मफल की सूचना शुभ ग्रहों द्वारा और बुरे कर्मों की सूचना अशुभ ग्रहों द्वारा होती है।

वास्तव में किसी भी मनुष्य के सुख-दु:ख का कारण ग्रह-नक्षत्र नहीं है । ग्रह कर्मों के फलदाता और कर्मफलों के सूचक हैं। जीवों के कर्मों का फल देने वाले भगवान श्रीविष्णु ही ग्रहरूप में रहते हैं । सूर्य का रामावतार, चन्द्रमा का कृष्णावतार, मंगल का नृसिंहावतार, बुध का बुद्धावतार, बृहस्पति का वामनावतार, शुक्र का परशुरामावतार, शनि का कूर्मावतार, राहु का वराहावतार और केतु का मीनावतार है । (लोमशसंहिता)

मनुष्य के कर्मफल का भण्डार अक्षय है उसे भोगने के लिए ही जीव चौरासी लाख योनियों में शरीर धारण करता आ रहा है। इसीलिए मानव शरीर का एक नाम ‘भोगायतन’ है।

कर्मफल अटल हैं इन्हें भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता है। हम अपने सुख-दु:ख, सौभाग्य-दुर्भाग्य के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं, इसके लिए विधाता या अन्य किसी को दोष नहीं दिया जा सकता है—ऐसा जानकर शान्त रहना चाहिए।

रामचरितमानस में तुलसीदासजी कहते हैं—
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता ।। (राचमा २।९२।४)

प्रकृति ने मानव जीवन में सन्तुलन के लिए यह व्यवस्था की है कि कुण्डली में छ: भाव सुख के व छ: भाव दु:ख के हैं । दु:ख के बीज से सुख का अंकुर फूटता है। सुख के फल में दु:ख की गुठली होती है । सुख-दु:ख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

जैसा बोयेंगे वैसा पायेंगे!!!!!!!

जो हम बोते हैं, वही हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है । प्रकृति की इस व्यवस्था से सुख बांटने पर वह हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है और दूसरों को दु:ख देने पर वह भी कई गुना होकर हमारे पास आता है । जैसे बिना मांगे दु:ख मिलता है, वैसे ही बिना प्रयत्न के सुख मिलता है ।

करम प्रधान बिस्व करि राखा ।
जो जस करइ तो तस फलु चाखा ।। (राचमा २।२१९।४)

जब सुख-दु:ख हमारे ही कर्मों का फल है तो सुख आने पर हम क्यों फूल जाएं और दु:ख पड़ने पर मुरझाएं क्यों ? क्योंकि सुख-दु:ख सदा रहने वाले नहीं और क्षण-क्षण में बदलने वाले हैं । सुख-दु:ख जब अपनी ही करनी का फल हैं तो एक के साथ राग और दूसरे के साथ द्वेष किसलिए ? गीता में भगवान कहते हैं—

इहैव तैर्जित सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: । (५। १९)

अर्थात्—जिन लोगों के मन में सुख-दु:ख के भोग में समता आ गई है उन्होंने तो इसी जन्म में और इसी शरीर से ही संसार को जीत लिया और वे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए ।

मनुष्य स्वयं भाग्यविधाता!!!!!!!

भाग्य का विधान अटल है । जितने भी ज्योतिषीय उपाय हैं, वे सब तात्कालिक हैं । मनुष्य यदि अपने को एक  खूंटे (इष्टदेव) से बांध ले और ध्यान-जप, सत्कर्म और ईश्वरभक्ति को अपना ले तो जीवन में सब कुछ शुभ ही होगा । कर्म रूपी पुरुषार्थ से ही मनचाहे फल की प्राप्ति होती है । मनुष्य स्वयं भाग्यविधाता है काल तो केवल कर्मफल को प्रस्तुत कर देता है ।

यदि मनुष्य जन्म-मरण के जंजाल से छूटना चाहता है तो भगवान ने उसका भी रास्ता गीता में बताया है—

‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरते तथा ।’ (अध्याय ४। ३७)

ज्ञानरूपी अग्नि संचित कर्म के बड़े-से-बड़े भण्डार को क्षणभर में जला डालती है । ज्ञान की चिनगारी जब पाप के ईंधन पर गिरती है तो पाप जलते हैं । ज्ञान को अपनाने पर कर्म सुधरेंगे । तत्वज्ञान होने से कर्म वास्तव में कर्म नहीं रह जाते तब उनका फल तो कैसे ही हो सकता है ? अत: समस्त कर्मों के साथ उनका कर्मफल भी मिट जाता है और जीव को पुन: शरीर धारण नहीं करना पड़ता ।

यह ज्ञान क्या है? यह है— हम भगवान के हैं, वे हमारे हैं, फिर उनसे हमारा भेद क्या? हम दासत्व स्वीकार कर लें और जो कुछ करें उनके लिए करें (सब कर्म कृष्णार्पण कर दें) या फल की भावना का त्याग कर दें नहीं तो कर्म रूपी भयंकर सर्प काटता ही रहेगा। करने में सावधान रहें और जो हो जाए उसमें प्रसन्न रहे एवं भगवन्नाम जपते रहें, आप एक सच्चे कर्मयोगी बन जाएंगे।

कर से कर्म करो विधि नाना ।
मन राखो जहां कृपा निधाना ।।

प्रभु बैठे आकाश में लेकर कलम दवात।
खाते में वह हर घड़ी लिखते सबकी बात ।।
मेरे मालिक की दुकान में सब लोगों का खाता ।
जितना जिसके भाग्य में होता वह उतना ही पाता ।।
क्या साधु क्या संत, गृहस्थी, क्या राजा क्या रानी ।
प्रभु की पुस्तक में लिखी है सबकी कर्म कहानी ।।
सभी जनों के जमाखर्च का सही हिसाब लगाता ।
बड़े-बड़े कानून प्रभु के, बड़ी बड़ी मर्यादा ।।
किसी को कौड़ी कम नहीं देता और न दमड़ी ज्यादा ।
इसीलिए तो दुनिया में वह जगतसेठ कहलाता ।।
करते हैं सभी फैसले प्रभु आसन पर डट के ।
उनके फैसले कभी न बदले, लाख कोई सर पटके ।।
समझदार तो चुप रहता है, मूर्ख शोर मचाता ।
अच्छी करनी करो चतुरजन, कर्म न करियो काला ।।
धर्म कर्म मत भूलो रे भैया, समय गुजरता जाता ।
मेरे मालिक की दुकान में सब लोगों का खाता ।।

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,। 🦚 मेरे सांवरिया ,,,,,, !!!❣ *!! सिर्फ दो शब्द !!*"शिकायत" *!! मेरे दिल ने आज ये ज़ुर्रत कर ली !!* *!! तुमसे पूछे बिना तुमसे मोहब्बत कर ली !!* 🦚🌹कृष्णमय रात्रि🌹🦚

🦚 my dear,,,,,, !!!                     * !! Just two words !! * "Complaint"       * !! My heart started doing this today !! *   * !! Loved you without asking you !! *              Krishnamay
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर करें ये उपाय.....  🌾🍁🏯👏👏🛕👏👏🏯🍁🌾   🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और साथ ही निसंतान दंपतियों को संतान सुख भी प्रदान करते हैं। तो आइए जान लेते हैं कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किन बेहद सरल उपायों को करके आप भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद अपने जीवन में प्राप्त कर सकते हैं। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🌷आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपने घर पर गाय और बछड़े की मूर्ति ले आयें। संतान प्राप्ति के लिए भी आप गाय और बछड़े की मूर्ति अपने घर में लाकर रख लें। 💐श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन यदि आप भगवान कृष्ण को परिजात के फूल अर्पित करते हैं तो इससे आपको भगवान श्री कृष्ण की प्रसन्नता हासिल होती है। 🌺 समस्त मनोकामना पूर्ति और अपने जीवन में सुख सुविधाओं के लिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण को चांदी की बांसुरी अर्पित करें।  🌹वास्तु दोष की समस्या से परेशान हैं तो आपको श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपने घर में मोर पंख लाकर रखने की सलाह दी जाती है। ☀ इसके अलावा श्री...