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*जो बाहर की सुनता है वो बिखर जाता है, जो अपने अंदर की सुनता है संवर जाता है... निखर जाता है। by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब: हमलोग प्रायतः बाहर की सुनते हैं... मतलब संसार वालों की सुनते हैं... उनके खुसी के लिए सबकुछ करते हैं... दिनरात... वो भी भावपूर्ण से। जो हमारे अंदर स्थित है... मतलब श्रीहरि गुरु... उनकी वाणी हमलोग नहीं सुनते...यदि सुनते भी हैं, तो नजरअंदाज कर देते हैं। हमारे लिए उनकी वाणी गौण होता है। तो हमारा विखरना तय है...भवसागर में बहना एवम् बहकना निश्चित ही है। संसार का प्रेम बाहर से आता है, और भगवत्प्रेम भीतर से यानि हृदय से आता है... हम आत्मा हैं इसीलिए हृदय की ओर देखना चाहिए... ना की मन की ओर। अपने मन को अंतर्मुखी करना है... शरणागत होना है... राधे राधे*🙏🚩,

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